नवभारत
टाइम्स: नई
दिल्ली: Tuesday, 23 December 2014.
दिल्ली
हाई कोर्ट ने साफ किया है कि सुप्रीम कोर्ट के जजों के मेडिकल रीइम्बर्समेंट का
सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत खुलासा नहीं किया जा सकता, क्योंकि इससे जनता का हित नहीं जुड़ा है। जस्टिस विभु
बाखरु ने कहा कि केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने सुप्रीम कोर्ट रजिस्टरी को मांगी
गई सूचना देने का निर्देश देकर गलती की।
उन्होंने
कहा कि मेडिकल रेकॉर्ड को तब तक डिस्क्लोज किए जाने की जरूरत नहीं है, जब तक उससे बड़े पैमाने पर जनहित न जुड़ा हो। अदालत
ने कहा, मौजूदा मामले में सीआईसी ने इस
पहलू की पूरी तरह अनदेखी की है। साथ ही,
किसी व्यक्ति का मेडिकल
रीइम्बर्समेंट एक तरह से पर्सनल इन्फर्मेशन है, क्योंकि
इससे यह पता चल जाएगा कि एक व्यक्ति ने किस हद तक मेडिकल सर्विस हासिल की। इसलिए
जब तक यह साबित न किया जाए कि इससे बड़े पैमाने पर पब्लिक इंटरेस्ट जुड़ा है, तब तक इस तरह की सूचना देने की जरूरत नहीं है। अदालत
ने यह टिप्पणी सीआईसी के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट रजिस्टरी की याचिका पर अपना
फैसला सुनाते हुए की। सीआईसी ने सुप्रीम कोर्ट रजिस्टरी को निर्देश दिया था कि वह
याचिकाकर्ता को पिछले तीन सालों में अपने हरेक जज द्वारा लिए गए मेडिकल
रीइम्बर्समेंट का ब्यौरा रखे। हाई कोर्ट ने सीआईसी के आदेश को गलत ठहराया।