Times of India: Gandhinagar: Thursday, 23 April 2026.
बॉम्बे हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि सर्विस रिकॉर्ड निजी जानकारी होती है, जिसे सूचना का अधिकार (RTI Act) के तहत सार्वजनिक करने से छूट मिली हुई। कोर्ट ने कहा कि ऐसी जानकारी को सार्वजनिक करने का आदेश तब तक नहीं दिया जा सकता, जब तक कि संबंधित अथॉरिटी इस बात से संतुष्ट न हो जाए कि व्यापक जनहित के लिए ऐसा करना ज़रूरी है।
जस्टिस आबासाहेब डी. शिंदे एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। इस याचिका में राज्य सूचना आयोग के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस के सर्विस रिकॉर्ड को सार्वजनिक करने का निर्देश दिया गया। याचिका के जवाब में प्रतिवादी ने RTI Act के तहत याचिकाकर्ता के सर्विस रिकॉर्ड से जुड़ी जानकारी मांगी, जिसमें उसकी नौकरी से संबंधित विवरण भी शामिल थे। सूचना अधिकारी और प्रथम अपीलीय अथॉरिटी दोनों ने ही इस आवेदन को खारिज कर दिया। हालांकि, दूसरी अपील में राज्य सूचना आयोग ने इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया और जानकारी को सार्वजनिक करने का निर्देश दिया।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि मांगी गई जानकारी उसके निजी सर्विस रिकॉर्ड से संबंधित थी और प्रतिवादी का ऐसी जानकारी से कोई लेना-देना नहीं था। उसने आगे कहा कि सूचना आयोग RTI Act की धारा 8(1)(j) के प्रावधानों पर विचार करने में विफल रहा। यह धारा निजी जानकारी को सार्वजनिक करने से छूट देती है। साथ ही आयोग ने धारा 11 के तहत याचिकाकर्ता को 'तीसरे पक्ष' के तौर पर सुनवाई का अवसर देने की शर्त का भी पालन नहीं किया। दूसरी ओर, प्रतिवादी ने दलील दी कि यह जानकारी इस बात की पुष्टि करने के लिए ज़रूरी है कि क्या याचिकाकर्ता ने वैध जाति प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी हासिल की है और इसमें जनहित भी शामिल है।
कोर्ट ने RTI Act की वैधानिक व्यवस्था की जांच की और पाया कि धारा 8(1)(j) स्पष्ट रूप से निजी जानकारी को सार्वजनिक करने से छूट देती है, जब तक कि जनहित में ऐसा करना उचित न हो। कोर्ट ने आगे कहा कि किसी तीसरे पक्ष से संबंधित जानकारी को सार्वजनिक करने का निर्देश देने से पहले अथॉरिटी के लिए यह ज़रूरी है कि वह RTI Act की धारा 11 का पालन करे। इसके तहत संबंधित व्यक्ति को नोटिस जारी करना और उसे सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है। कोर्ट ने पाया कि इस मामले में जानकारी को सार्वजनिक करने का निर्देश देने से पहले याचिकाकर्ता को ऐसा कोई अवसर नहीं दिया गया।
कोर्ट ने फैसला दिया कि चुनौती दिया गया आदेश RTI Act की धारा 8(1)(j) और 11 के प्रावधानों के विपरीत है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि इस आदेश में जनहित की संतुष्टि दर्ज किए बिना और प्रभावित पक्ष को सुनवाई का अवसर दिए बिना ही निजी जानकारी को सार्वजनिक करने का निर्देश दे दिया गया।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
"...दूसरी अपीलीय अथॉरिटी द्वारा पारित विवादित आदेश न केवल
धारा 8 (1) (j) के प्रावधानों के विपरीत है—क्योंकि यह जानकारी
याचिकाकर्ता के सर्विस रिकॉर्ड, यानी उसकी निजी जानकारी से
संबंधित है। इसे स्पष्ट रूप से जानकारी सार्वजनिक करने के दायरे से छूट दी
गई—बल्कि यह RTI Actम की धारा 11 के प्रावधानों के भी विपरीत
है।"
तदनुसार, हाईकोर्ट ने रिट याचिका स्वीकार की और राज्य सूचना आयोग का आदेश रद्द किया, जिसमें याचिकाकर्ता के सर्विस रिकॉर्ड को सार्वजनिक करने का निर्देश दिया गया।
Case Title: Narsing Ganpatrao Ankushkar vs. Balaji Pandharinath Thorat & Ors. [Writ Petition No. 4075 of 2015]
बॉम्बे हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि सर्विस रिकॉर्ड निजी जानकारी होती है, जिसे सूचना का अधिकार (RTI Act) के तहत सार्वजनिक करने से छूट मिली हुई। कोर्ट ने कहा कि ऐसी जानकारी को सार्वजनिक करने का आदेश तब तक नहीं दिया जा सकता, जब तक कि संबंधित अथॉरिटी इस बात से संतुष्ट न हो जाए कि व्यापक जनहित के लिए ऐसा करना ज़रूरी है।
जस्टिस आबासाहेब डी. शिंदे एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। इस याचिका में राज्य सूचना आयोग के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस के सर्विस रिकॉर्ड को सार्वजनिक करने का निर्देश दिया गया। याचिका के जवाब में प्रतिवादी ने RTI Act के तहत याचिकाकर्ता के सर्विस रिकॉर्ड से जुड़ी जानकारी मांगी, जिसमें उसकी नौकरी से संबंधित विवरण भी शामिल थे। सूचना अधिकारी और प्रथम अपीलीय अथॉरिटी दोनों ने ही इस आवेदन को खारिज कर दिया। हालांकि, दूसरी अपील में राज्य सूचना आयोग ने इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया और जानकारी को सार्वजनिक करने का निर्देश दिया।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि मांगी गई जानकारी उसके निजी सर्विस रिकॉर्ड से संबंधित थी और प्रतिवादी का ऐसी जानकारी से कोई लेना-देना नहीं था। उसने आगे कहा कि सूचना आयोग RTI Act की धारा 8(1)(j) के प्रावधानों पर विचार करने में विफल रहा। यह धारा निजी जानकारी को सार्वजनिक करने से छूट देती है। साथ ही आयोग ने धारा 11 के तहत याचिकाकर्ता को 'तीसरे पक्ष' के तौर पर सुनवाई का अवसर देने की शर्त का भी पालन नहीं किया। दूसरी ओर, प्रतिवादी ने दलील दी कि यह जानकारी इस बात की पुष्टि करने के लिए ज़रूरी है कि क्या याचिकाकर्ता ने वैध जाति प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी हासिल की है और इसमें जनहित भी शामिल है।
कोर्ट ने RTI Act की वैधानिक व्यवस्था की जांच की और पाया कि धारा 8(1)(j) स्पष्ट रूप से निजी जानकारी को सार्वजनिक करने से छूट देती है, जब तक कि जनहित में ऐसा करना उचित न हो। कोर्ट ने आगे कहा कि किसी तीसरे पक्ष से संबंधित जानकारी को सार्वजनिक करने का निर्देश देने से पहले अथॉरिटी के लिए यह ज़रूरी है कि वह RTI Act की धारा 11 का पालन करे। इसके तहत संबंधित व्यक्ति को नोटिस जारी करना और उसे सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है। कोर्ट ने पाया कि इस मामले में जानकारी को सार्वजनिक करने का निर्देश देने से पहले याचिकाकर्ता को ऐसा कोई अवसर नहीं दिया गया।
कोर्ट ने फैसला दिया कि चुनौती दिया गया आदेश RTI Act की धारा 8(1)(j) और 11 के प्रावधानों के विपरीत है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि इस आदेश में जनहित की संतुष्टि दर्ज किए बिना और प्रभावित पक्ष को सुनवाई का अवसर दिए बिना ही निजी जानकारी को सार्वजनिक करने का निर्देश दे दिया गया।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
तदनुसार, हाईकोर्ट ने रिट याचिका स्वीकार की और राज्य सूचना आयोग का आदेश रद्द किया, जिसमें याचिकाकर्ता के सर्विस रिकॉर्ड को सार्वजनिक करने का निर्देश दिया गया।
Case Title: Narsing Ganpatrao Ankushkar vs. Balaji Pandharinath Thorat & Ors. [Writ Petition No. 4075 of 2015]















