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Dunia: New Delhi: Monday, 27 October 2014.
कोई
भी सरकारी विभाग या संस्थान सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत मांगी गई
जानकारी का जवाब देने से यह कह कर नहीं बच सकता कि उसने सरकार की नीति पर अमल करते
हुए संबंधित दस्तावेज नष्ट कर दिए हैं।
केंद्रीय
सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्युलु ने व्यवस्था दी है कि अगर किसी नागरिक ने आरटीआई
अर्जी दाखिल कर कोई जानकारी मांगी है और उसकी अर्जी लंबित है तो इस दौरान उससे
संबंधित रिकार्ड्स को सरकार की गैर जरूरी दस्तावेज खत्म करो नीति के तहत भी नष्ट
नहीं किया जा सकता है। सूचना आयुक्त के अनुसार ऐसा करना सूचना का अधिकार कानून का
उल्लंघन होगा।
आचार्युलु
ने आरटीआई कार्यकर्ता अशोक दीक्षित की याचिका पर उपरोक्त व्यवस्था दी। दीक्षित ने
अपनी आरटीआई अर्जी पर दिल्ली टेक्नोलाजिकल यूनिवर्सिटी के जवाब के खिलाफ केंद्रीय
सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाया था। आरटीआई कार्यकर्ता ने अर्जी दाखिल कर
यूनिवर्सिटी प्रशासन से कुछ जानकारी मांगी थी।
जिसके
जवाब में यूनिवर्सिटी की ओर से दीक्षित को बताया कि उन्हें संबंधित मामले में
जानकारी नहीं दी जा सकती है क्योंकि उससे जुड़े दस्तावेजों को सरकारी नीति के तहत
नष्ट कर दिया गया है। सूचना आयुक्त ने यूनिवर्सिटी प्रशासन के इस जवाब पर नाखुशी
जताते हुए कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया।
आचार्युलु
ने यूनिवर्सिटी प्रशासन से पूछा है कि क्यों नहीं इस हरकत के लिए यूनिवर्सिटी पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगा दिया जाए। सूचना आयुक्त
का कहना था, "यूनिवर्सिटी प्रशासन को यह
बताना होगा कि दस्तावेज नष्ट करने के दौरान क्या पब्लिक रिकार्ड्स एक्ट 1993 का अनुपालन किया गया। क्या दस्तावेज नष्ट करने से
संबंधित कोई नियम बनाया गया। अगर बनाया गया तो उसे लागू करने का इंचार्ज कौन
अधिकारी है। जब याचिकाकर्ता ने जानकारी मांगी है तो नष्ट किए गए दस्तावेजों पर
क्या आख्या लिखी हुई थी।
"आचार्युलु
के मुताबिक, "आरटीआई अर्जी दाखिल होने के
बाद उससे संबंधित दस्तावेजों को नष्ट किया जा सकता है। ऐसा करना आरटीआइ कानून की
धारा 20 का उल्लंघन है और जुर्माना
लगाया जा सकता है।"
(Order)
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