ETV Bharat: Patna: Friday, 16th October 2026.
करोड़ों के घोटाले उजागर करने वाले आरटीआई एक्टिविस्ट शिव प्रकाश राय ने राजनीति के बड़े ऑफर्स ठुकरा कर सिर्फ सच का साथ चुना. रिपोर्ट-रंजीत कुमार
'मैं सिर्फ 17 साल का था, लेकिन ब्लॉक सर्किल
ऑफिसर के ऑफिस में भागा, जो एक गांव वाले को चीनी का परमिट नहीं दे रहे
थे, मेरी बहस शुरू हो गई और मुझे ड्यूटी पर मौजूद एक सरकारी कर्मचारी को परेशान
करने के लिए गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया..''ये शब्द हैं बिहार के
70 वर्षीय आरटीआई एक्टिविस्ट शिव
प्रकाश राय के.
कई घोटालों का पर्दाफाश
आरटीआई के जरिए बिहार की जड़ें हिलाने वाले शिव प्रकाश राय ने इसी 'सूचना के अधिकार' की मदद से कई घोटालों का पर्दाफाश किया. भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई कमजोर न पड़ें इसके लिए राजनीति में आने का ऑफर भी ठुकरा दिया.
मुसीबतों का सामना
RTI एक्टिविस्ट शिव प्रकाश राय ने बिहार में कई घोटालों का पर्दाफाश किया है, चाहे वह 2013 में 100 करोड़ रुपये का सोलर लैंप खरीद घोटाला हो या 4,000 करोड़ रुपये का धान घोटाला. भ्रष्टाचार के खिलाफ इस कठिन लड़ाई के लिए उन्हें कई मुसीबतों का सामना करना पड़ा, कई झंझावात झेले, 29 दिन जेल की सजा भी भुगतनी पड़ी, पर इनका सफर आज भी जारी है.
भ्रष्टाचार के मामले में दूसरे स्थान पर बिहार
भ्रष्टाचार के मामले में बिहार राष्ट्रीय स्तर पर दूसरे स्थान पर है, और राज्य में कई लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ लंबे समय से लड़ाई भी लड़ रहे हैं. बिहार में आरटीआई एक्टिविस्ट होना इतना आसान भी नहीं हैं. शिव प्रकाश राय बताते कि बिहार में अब तक 20 से 25 आरटीआई एक्टिविस्ट्स की हत्या हो चुकी है.
उत्पीड़न के झूठे मामले दर्ज
शिव प्रकाश के मुताबिक इसके अलावा 250 से 300 आरटीआई एक्टिविस्ट्स के खिलाफ उत्पीड़न के झूठे मामले दर्ज किए गए हैं. कई बार उन्हें डराया धमकाया भी जाता है. उन्होंने बताया कि मैं आज तक ना तो किसी से डरा हूं ना ही प्रलोभन के झांसे में आया हूं.
पुणे में दर्ज हुई थी पहली आरटीआई
अपने इस सफर के बारे में बात करते हुए शिव प्रकाश कहते हैं कि फर्जी मुकदमे में जेल जाने के बाद भी हमारा अभियान थमा नहीं है और अनवरत जारी है. उन्होंने बताया कि भारत में सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act 2005) के तहत दायर की जाने वाली पहली आरटीआई (RTI) पुणे के एक पुलिस स्टेशन में शाहिद रज़ा बर्नी (Shahid Raza Burney) द्वारा दायर की गई थी.
17 साल की उम्र में गए जेल
शिव प्रकाश एक घटना का जिक्र करते हुए कहते हैं कि मैंने तब भी जानकारी के लिए बहुत कोशिश की. तब मैं सिर्फ 17 साल का था, लेकिन ब्लॉक सर्किल ऑफिसर के ऑफिस में भागा, जो एक गांव वाले को चीनी का परमिट नहीं दे रहे थे, मेरी बहस शुरू हो गई और मुझे ड्यूटी पर मौजूद एक सरकारी कर्मचारी को परेशान करने के लिए गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया.
आरटीआई: भ्रष्टाचार के खिलाफ हथियार
शिव प्रकाश राय पिछले 25 साल से हर रोज बक्सर से पटना आते हैं और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को धार देने में लग जाते हैं. उन्होंने आरटीआई को भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का हथियार बनाया है. इसी की मदद से कई बड़े घोटाले का पर्दाफाश भी किया है और यह सिलसिला आज भी अनवरत जारी है.
फर्जी मुकदमे में 29 दिनों तक जेल
शिव प्रकाश राय धान खरीद घोटाला, शिक्षक नियुक्ति घोटाला, बालू घोटाला, अलकतरा घोटाला, पेंशन, भूमि और बॉडीगार्ड नियुक्ति सहित कई मामलों को पटल पर लेकर आए. वहीं इस संघर्ष की कीमत भी उन्हें चुकानी पड़ी, एक झूठे मुकदमे में 29 दिनों तक जेल में भी रहना पड़ा, हालांकि बाद में जांच के दौरान केस असत्य पाया गया.
जब सवाल पूछना बन गया अपराध
दरअसल साल 2008 में तत्कालीन बक्सर जिलाधिकारी विष्णुदेव प्रसाद सिंह ने शिवप्रकाश राय पर आरोप लगाया कि वे डीएम के कक्ष में घुसकर हर महीने 25 हजार रुपये रंगदारी मांग रहे थे, शिव प्रकाश राय के खिलाफ प्राथमिक की भी दर्ज कराई गई. मामले में उन्हें जेल भेजा गया और वे 29 दिन जेल में बंद रहे. बाद में पुलिस अधीक्षक ने यह मामला असत्य पाया, जिसके बाद उन्हें रोप मुक्त करार दिया गया.
"जब भ्रष्टाचार उजागर होता है, तो प्रशासनिक अधिकारी दबाव और झूठे केस जैसे अवैध तरीकों का सहारा लेते है. यह घटना मेरे जीवन का निर्णायक मोड़ बनी और मैने आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हो रहे उत्पीड़न को बड़े पैमाने पर उठाना शुरू किया." -शिव प्रकाश राय, आरटीआई एक्टिविस्ट
बक्सर के तत्कालीन डीएम हुए बेनकाब
शिव प्रकाश राय बताते हैं कि बक्सर के किसानों को सरकार की ओर से बोरिंग और ट्यूबेल लगाने के लिए राशि भेजी गई थी जिसमें 80% सब्सिडी थी. किसानों के खेतों तक बोरिंग तो नहीं पहुंचे लेकिन पैसों की बंदरबांट जरूर हो गई. मामले का खुलासा उनके आरटीआई के जरिए हुआ था. जिस दुकान से खरीद की बात कही गई थी वह दुकान बक्सर में था ही नहीं. बाद में कई अधिकारी बाद में सस्पेंड हुए.
धान खरीद घोटाले का भी हुआ पर्दाफाश
शिव प्रकाश राय का सबसे बड़ा योगदान बिहार के अन्दर धान खरीद घोटाले को उजागर करने में रहा है. अगस्त 2012 में उन्होंने मुख्यमंत्री जनशिकायत प्रकोष्ठ को पत्र लिखकर आरोप लगाया कि सरकारी धान को मिलों द्वारा खुले बाजार में बेचा जा रहा था और मीलिंग के नाम पर बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हो रही थी.
उचित जांच और कार्रवाई नहीं
शिव प्रकाश बताते हैं कि उन्होंने इस मामले की जानकारी खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग और सतर्कता विभाग के प्रमुख सचिवों को भी भेजी. अक्टूबर 2012 में सतर्कता विभाग के संयुक्त सचिव ने खाद्य विभाग को कार्रवाई के लिए पत्र भेजा, लेकिन राय का आरोप रहा कि मामले में उचित जांच और कार्रवाई नहीं की गई.
3000 करोड़ से अधिक का धान खरीद घोटाला
ये मामला इतना बड़ा बना कि बाद में पटना हाईकोर्ट तक पहुंच गया. राय ने धान घोटाले पर याचिका दायर की और आरोप लगाया कि केंद्र व राज्य सरकारें आरोपियों को बचाने में जुटी हैं. राज्य में इस घोटाले का अनुमान 3,000 करोड़ रुपये से अधिक का बताया गया था, हालांकि बाद में मामले को आर्थिक अपराध अधिकारी को दिया गया और आरोपियों से कुछ हद तक रिकवरी भी हुई.
बॉडीगार्ड नियुक्ति घोटाला में 100 करोड़ का नुकसान
धान खरीद के अलावा शिव प्रकाश राय ने कई अन्य मामलों में सूचना मांगकर भ्रष्टाचार की परतें खोलीं और उन मामलों को उजागर किया. उनकी आरटीआई से बॉडीगार्ड नियुक्ति घोटाला सामने आया. बॉडीगार्ड नियुक्ति घोटाला में कैग की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य को 100 करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व नुकसान हुआ था.
सूचना के बदले अधिकारियों ने मांगे 1 करोड़ से अधिक
शिव प्रकाश अपने साथ हुई एक दिलचस्प घटना का जिक्र करते हुए कहते हैं कि जब बेगूसराय में भू-माफिया की गतिविधियों की जांच के लिए भूमि रजिस्ट्रेशन से जुड़े दस्तावेज देखने की मांग की गई, तो इसके बदले अधिकारियों ने उनसे 1.34 करोड़ रुपये की फीस मांग ली. शिव प्रकाश ने इसे आरटीआई के इस्तेमाल को रोकने की कोशिश करार दिया.
आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हमले
शिव प्रकाश राय बताते हैं कि बिहार में एक दशक में आरटीआई कार्यकर्ताओं के खिलाफ हिंसा और उत्पीड़न के 213 मामले दर्ज हुए, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों या व्यक्तियों पर कार्रवाई की जानकारी नहीं दी गई. इनमें से अधिकतर मामले पंचायत योजनाओं, पैक्स द्वारा धान खरीद, मनरेगा और शिक्षक भर्ती से जुड़े थे.उनके मुताबिक जानकारी मांगने वालों की हत्या, धमकी और झूठे मामलों में फंसाना आम बात बन गई है.
शिक्षा विभाग में नियुक्ति घोटाले का पर्दाफाश
बिहार के शिक्षा विभाग में हुए नियुक्ति और वेतन घोटालों में मुख्य रूप से फर्जी डिग्रियों, फर्जी दस्तावेजों और कागजों पर मौजूद, लेकिन अनुपस्थित शिक्षकों (घोस्ट टीचर्स) के नाम पर सरकारी खजाने से अवैध रूप से वेतन निकासी का मामला शामिल रहा है.
मामले को उच्च न्यायालय तक पहुंचाया
हाल ही में हजारों फर्जी शिक्षकों की बर्खास्तगी और वेतन वसूली की कार्रवाई की गई है. शिव प्रकाश राय ने ही मामले को उच्च न्यायालय तक पहुंचाया. इनके प्रयास से बड़े पैमाने पर शिक्षा विभाग में भ्रष्टाचार के मामले सामने आए.
सुशील मोदी ने दिया था न्यौता
शिव प्रकाश राय ने ईटीवी भारत से बातचीत में बताया कि वे अटल बिहारी वाजपेई को बेहद पसंद करते थे. उन्होंने कहा कि सुशील मोदी ने कई बार मुझसे मिलने की कोशिश की दो बार न्योता भी दिया, शायद वह मुझे राजनीति में लाना चाहते थे मैं इसलिए राजनीति में नहीं गया क्योंकि मेरी लड़ाई कमजोर हो सकती थी. कुल मिलाकर शिवप्रकाश राय के संघर्ष और घोटालों के पर्दाफाश ने बिहार की सियासत में भी गूंज पैदा की.
"सुशील मोदी ने कई बार मुझसे मिलने की कोशिश की दो बार न्योता भी दिया, शायद वह मुझे राजनीति में लाना चाहते थे मैं इसलिए राजनीति में नहीं गया क्योंकि मेरी लड़ाई कमजोर हो सकती थी. मुझे लोग राजनीतिक चश्मे से देखने लगते."- शिव प्रकाश राय, आरटीआई एक्टिविस्ट
66 जनहित याचिका दायर की
69 साल उम्र पूरी कर चुके शिव प्रकाश राय अब तक 66 जनित याचिका दायर कर चुके हैं. बिहार में भ्रष्टाचार के मामलों को लगातार सामने ला रहे हैं. शिव प्रकाश राय कहते हैं कि शुरुआत के 10 साल तो आरटीआई एक मजबूत हथियार था लेकिन बाद के दिनों में सरकार ने आरटीआई के धार को कुंद किया और आयोग में आरोग्य अधिकारियों की तैनाती की गई.
"हम वीर कुंवर सिंह की धरती के हैं. 80 साल में उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ तलवार उठाई थी हम भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई से ना तो थके हैं ना ही रुकने वाले हैं. भ्रष्टाचार के खिलाफ मेरी यह लड़ाई जारी रहेगी चाहे इसके लिए मुझे जान की कीमत क्यों न चुकानी पड़े."- शिव प्रकाश राय, आरटीआई एक्टिविस्ट
क्या है आरटीआई कानून ?
गौरतलब है कि सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act 2005) भारत सरकार और सरकारी विभागों में पारदर्शिता और जवाबदेही लाने वाला एक बेहद मजबूत कानून है. यह अधिनियम 15 जून 2005 को संसद से पारित हुआ और 12 अक्टूबर 2005 से पूरे देश में पूरी तरह लागू हो गया.
आवेदन की फीस
इस कानून के तहत कोई भी आम नागरिक सरकारी कामकाज की जानकारी मांग सकता है, जिसके लिए सामान्य तौर पर सिर्फ ₹10 का आवेदन शुल्क तय किया गया है. हालांकि, गरीबी रेखा से नीचे (BPL) आने वाले नागरिकों को इस फीस से पूरी छूट दी गई है.
जवाब मिलने की तय समय-सीमा
आरटीआई के तहत जानकारी देने के लिए सरकार ने सख्त समय-सीमा तय की है। किसी भी सामान्य मामले में लोक सूचना अधिकारी को आवेदन मिलने के 30 दिनों के भीतर जवाब देना है. वहीं, अगर मामला किसी व्यक्ति के जीवन या उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा हो, तो प्रशासन को मात्र 48 घंटों के भीतर जानकारी देनी पड़ती है. इसके अलावा, यदि मांगी गई जानकारी किसी तीसरी पार्टी से संबंधित हो, तो इसके लिए 40 दिन का समय निर्धारित है.
लापरवाही बरतने पर भारी जुर्माना
यदि कोई लोक सूचना अधिकारी तय समय में जानकारी नहीं देता या जानबूझकर लापरवाही बरतता है, तो कानून में कड़े जुर्माने का प्रावधान है. देर की स्थिति में दोषी अधिकारी पर ₹250 प्रतिदिन के हिसाब से जुर्माना लगाया जाता है. यह जुर्माना राशि अधिकतम ₹25,000 तक हो सकती है, जो सीधे अधिकारी की सैलरी से कटती है.
करोड़ों के घोटाले उजागर करने वाले आरटीआई एक्टिविस्ट शिव प्रकाश राय ने राजनीति के बड़े ऑफर्स ठुकरा कर सिर्फ सच का साथ चुना. रिपोर्ट-रंजीत कुमार
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| पटना में RTI एक्टिविस्ट शिव प्रकाश राय (ETV Bharat) |
आरटीआई के जरिए बिहार की जड़ें हिलाने वाले शिव प्रकाश राय ने इसी 'सूचना के अधिकार' की मदद से कई घोटालों का पर्दाफाश किया. भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई कमजोर न पड़ें इसके लिए राजनीति में आने का ऑफर भी ठुकरा दिया.
मुसीबतों का सामना
RTI एक्टिविस्ट शिव प्रकाश राय ने बिहार में कई घोटालों का पर्दाफाश किया है, चाहे वह 2013 में 100 करोड़ रुपये का सोलर लैंप खरीद घोटाला हो या 4,000 करोड़ रुपये का धान घोटाला. भ्रष्टाचार के खिलाफ इस कठिन लड़ाई के लिए उन्हें कई मुसीबतों का सामना करना पड़ा, कई झंझावात झेले, 29 दिन जेल की सजा भी भुगतनी पड़ी, पर इनका सफर आज भी जारी है.
भ्रष्टाचार के मामले में दूसरे स्थान पर बिहार
भ्रष्टाचार के मामले में बिहार राष्ट्रीय स्तर पर दूसरे स्थान पर है, और राज्य में कई लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ लंबे समय से लड़ाई भी लड़ रहे हैं. बिहार में आरटीआई एक्टिविस्ट होना इतना आसान भी नहीं हैं. शिव प्रकाश राय बताते कि बिहार में अब तक 20 से 25 आरटीआई एक्टिविस्ट्स की हत्या हो चुकी है.
उत्पीड़न के झूठे मामले दर्ज
शिव प्रकाश के मुताबिक इसके अलावा 250 से 300 आरटीआई एक्टिविस्ट्स के खिलाफ उत्पीड़न के झूठे मामले दर्ज किए गए हैं. कई बार उन्हें डराया धमकाया भी जाता है. उन्होंने बताया कि मैं आज तक ना तो किसी से डरा हूं ना ही प्रलोभन के झांसे में आया हूं.
पुणे में दर्ज हुई थी पहली आरटीआई
अपने इस सफर के बारे में बात करते हुए शिव प्रकाश कहते हैं कि फर्जी मुकदमे में जेल जाने के बाद भी हमारा अभियान थमा नहीं है और अनवरत जारी है. उन्होंने बताया कि भारत में सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act 2005) के तहत दायर की जाने वाली पहली आरटीआई (RTI) पुणे के एक पुलिस स्टेशन में शाहिद रज़ा बर्नी (Shahid Raza Burney) द्वारा दायर की गई थी.
17 साल की उम्र में गए जेल
शिव प्रकाश एक घटना का जिक्र करते हुए कहते हैं कि मैंने तब भी जानकारी के लिए बहुत कोशिश की. तब मैं सिर्फ 17 साल का था, लेकिन ब्लॉक सर्किल ऑफिसर के ऑफिस में भागा, जो एक गांव वाले को चीनी का परमिट नहीं दे रहे थे, मेरी बहस शुरू हो गई और मुझे ड्यूटी पर मौजूद एक सरकारी कर्मचारी को परेशान करने के लिए गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया.
आरटीआई: भ्रष्टाचार के खिलाफ हथियार
शिव प्रकाश राय पिछले 25 साल से हर रोज बक्सर से पटना आते हैं और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को धार देने में लग जाते हैं. उन्होंने आरटीआई को भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का हथियार बनाया है. इसी की मदद से कई बड़े घोटाले का पर्दाफाश भी किया है और यह सिलसिला आज भी अनवरत जारी है.
फर्जी मुकदमे में 29 दिनों तक जेल
शिव प्रकाश राय धान खरीद घोटाला, शिक्षक नियुक्ति घोटाला, बालू घोटाला, अलकतरा घोटाला, पेंशन, भूमि और बॉडीगार्ड नियुक्ति सहित कई मामलों को पटल पर लेकर आए. वहीं इस संघर्ष की कीमत भी उन्हें चुकानी पड़ी, एक झूठे मुकदमे में 29 दिनों तक जेल में भी रहना पड़ा, हालांकि बाद में जांच के दौरान केस असत्य पाया गया.
जब सवाल पूछना बन गया अपराध
दरअसल साल 2008 में तत्कालीन बक्सर जिलाधिकारी विष्णुदेव प्रसाद सिंह ने शिवप्रकाश राय पर आरोप लगाया कि वे डीएम के कक्ष में घुसकर हर महीने 25 हजार रुपये रंगदारी मांग रहे थे, शिव प्रकाश राय के खिलाफ प्राथमिक की भी दर्ज कराई गई. मामले में उन्हें जेल भेजा गया और वे 29 दिन जेल में बंद रहे. बाद में पुलिस अधीक्षक ने यह मामला असत्य पाया, जिसके बाद उन्हें रोप मुक्त करार दिया गया.
"जब भ्रष्टाचार उजागर होता है, तो प्रशासनिक अधिकारी दबाव और झूठे केस जैसे अवैध तरीकों का सहारा लेते है. यह घटना मेरे जीवन का निर्णायक मोड़ बनी और मैने आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हो रहे उत्पीड़न को बड़े पैमाने पर उठाना शुरू किया." -शिव प्रकाश राय, आरटीआई एक्टिविस्ट
बक्सर के तत्कालीन डीएम हुए बेनकाब
शिव प्रकाश राय बताते हैं कि बक्सर के किसानों को सरकार की ओर से बोरिंग और ट्यूबेल लगाने के लिए राशि भेजी गई थी जिसमें 80% सब्सिडी थी. किसानों के खेतों तक बोरिंग तो नहीं पहुंचे लेकिन पैसों की बंदरबांट जरूर हो गई. मामले का खुलासा उनके आरटीआई के जरिए हुआ था. जिस दुकान से खरीद की बात कही गई थी वह दुकान बक्सर में था ही नहीं. बाद में कई अधिकारी बाद में सस्पेंड हुए.
धान खरीद घोटाले का भी हुआ पर्दाफाश
शिव प्रकाश राय का सबसे बड़ा योगदान बिहार के अन्दर धान खरीद घोटाले को उजागर करने में रहा है. अगस्त 2012 में उन्होंने मुख्यमंत्री जनशिकायत प्रकोष्ठ को पत्र लिखकर आरोप लगाया कि सरकारी धान को मिलों द्वारा खुले बाजार में बेचा जा रहा था और मीलिंग के नाम पर बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हो रही थी.
उचित जांच और कार्रवाई नहीं
शिव प्रकाश बताते हैं कि उन्होंने इस मामले की जानकारी खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग और सतर्कता विभाग के प्रमुख सचिवों को भी भेजी. अक्टूबर 2012 में सतर्कता विभाग के संयुक्त सचिव ने खाद्य विभाग को कार्रवाई के लिए पत्र भेजा, लेकिन राय का आरोप रहा कि मामले में उचित जांच और कार्रवाई नहीं की गई.
3000 करोड़ से अधिक का धान खरीद घोटाला
ये मामला इतना बड़ा बना कि बाद में पटना हाईकोर्ट तक पहुंच गया. राय ने धान घोटाले पर याचिका दायर की और आरोप लगाया कि केंद्र व राज्य सरकारें आरोपियों को बचाने में जुटी हैं. राज्य में इस घोटाले का अनुमान 3,000 करोड़ रुपये से अधिक का बताया गया था, हालांकि बाद में मामले को आर्थिक अपराध अधिकारी को दिया गया और आरोपियों से कुछ हद तक रिकवरी भी हुई.
बॉडीगार्ड नियुक्ति घोटाला में 100 करोड़ का नुकसान
धान खरीद के अलावा शिव प्रकाश राय ने कई अन्य मामलों में सूचना मांगकर भ्रष्टाचार की परतें खोलीं और उन मामलों को उजागर किया. उनकी आरटीआई से बॉडीगार्ड नियुक्ति घोटाला सामने आया. बॉडीगार्ड नियुक्ति घोटाला में कैग की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य को 100 करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व नुकसान हुआ था.
सूचना के बदले अधिकारियों ने मांगे 1 करोड़ से अधिक
शिव प्रकाश अपने साथ हुई एक दिलचस्प घटना का जिक्र करते हुए कहते हैं कि जब बेगूसराय में भू-माफिया की गतिविधियों की जांच के लिए भूमि रजिस्ट्रेशन से जुड़े दस्तावेज देखने की मांग की गई, तो इसके बदले अधिकारियों ने उनसे 1.34 करोड़ रुपये की फीस मांग ली. शिव प्रकाश ने इसे आरटीआई के इस्तेमाल को रोकने की कोशिश करार दिया.
आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हमले
शिव प्रकाश राय बताते हैं कि बिहार में एक दशक में आरटीआई कार्यकर्ताओं के खिलाफ हिंसा और उत्पीड़न के 213 मामले दर्ज हुए, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों या व्यक्तियों पर कार्रवाई की जानकारी नहीं दी गई. इनमें से अधिकतर मामले पंचायत योजनाओं, पैक्स द्वारा धान खरीद, मनरेगा और शिक्षक भर्ती से जुड़े थे.उनके मुताबिक जानकारी मांगने वालों की हत्या, धमकी और झूठे मामलों में फंसाना आम बात बन गई है.
शिक्षा विभाग में नियुक्ति घोटाले का पर्दाफाश
बिहार के शिक्षा विभाग में हुए नियुक्ति और वेतन घोटालों में मुख्य रूप से फर्जी डिग्रियों, फर्जी दस्तावेजों और कागजों पर मौजूद, लेकिन अनुपस्थित शिक्षकों (घोस्ट टीचर्स) के नाम पर सरकारी खजाने से अवैध रूप से वेतन निकासी का मामला शामिल रहा है.
मामले को उच्च न्यायालय तक पहुंचाया
हाल ही में हजारों फर्जी शिक्षकों की बर्खास्तगी और वेतन वसूली की कार्रवाई की गई है. शिव प्रकाश राय ने ही मामले को उच्च न्यायालय तक पहुंचाया. इनके प्रयास से बड़े पैमाने पर शिक्षा विभाग में भ्रष्टाचार के मामले सामने आए.
सुशील मोदी ने दिया था न्यौता
शिव प्रकाश राय ने ईटीवी भारत से बातचीत में बताया कि वे अटल बिहारी वाजपेई को बेहद पसंद करते थे. उन्होंने कहा कि सुशील मोदी ने कई बार मुझसे मिलने की कोशिश की दो बार न्योता भी दिया, शायद वह मुझे राजनीति में लाना चाहते थे मैं इसलिए राजनीति में नहीं गया क्योंकि मेरी लड़ाई कमजोर हो सकती थी. कुल मिलाकर शिवप्रकाश राय के संघर्ष और घोटालों के पर्दाफाश ने बिहार की सियासत में भी गूंज पैदा की.
"सुशील मोदी ने कई बार मुझसे मिलने की कोशिश की दो बार न्योता भी दिया, शायद वह मुझे राजनीति में लाना चाहते थे मैं इसलिए राजनीति में नहीं गया क्योंकि मेरी लड़ाई कमजोर हो सकती थी. मुझे लोग राजनीतिक चश्मे से देखने लगते."- शिव प्रकाश राय, आरटीआई एक्टिविस्ट
66 जनहित याचिका दायर की
69 साल उम्र पूरी कर चुके शिव प्रकाश राय अब तक 66 जनित याचिका दायर कर चुके हैं. बिहार में भ्रष्टाचार के मामलों को लगातार सामने ला रहे हैं. शिव प्रकाश राय कहते हैं कि शुरुआत के 10 साल तो आरटीआई एक मजबूत हथियार था लेकिन बाद के दिनों में सरकार ने आरटीआई के धार को कुंद किया और आयोग में आरोग्य अधिकारियों की तैनाती की गई.
"हम वीर कुंवर सिंह की धरती के हैं. 80 साल में उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ तलवार उठाई थी हम भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई से ना तो थके हैं ना ही रुकने वाले हैं. भ्रष्टाचार के खिलाफ मेरी यह लड़ाई जारी रहेगी चाहे इसके लिए मुझे जान की कीमत क्यों न चुकानी पड़े."- शिव प्रकाश राय, आरटीआई एक्टिविस्ट
क्या है आरटीआई कानून ?
गौरतलब है कि सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act 2005) भारत सरकार और सरकारी विभागों में पारदर्शिता और जवाबदेही लाने वाला एक बेहद मजबूत कानून है. यह अधिनियम 15 जून 2005 को संसद से पारित हुआ और 12 अक्टूबर 2005 से पूरे देश में पूरी तरह लागू हो गया.
आवेदन की फीस
इस कानून के तहत कोई भी आम नागरिक सरकारी कामकाज की जानकारी मांग सकता है, जिसके लिए सामान्य तौर पर सिर्फ ₹10 का आवेदन शुल्क तय किया गया है. हालांकि, गरीबी रेखा से नीचे (BPL) आने वाले नागरिकों को इस फीस से पूरी छूट दी गई है.
जवाब मिलने की तय समय-सीमा
आरटीआई के तहत जानकारी देने के लिए सरकार ने सख्त समय-सीमा तय की है। किसी भी सामान्य मामले में लोक सूचना अधिकारी को आवेदन मिलने के 30 दिनों के भीतर जवाब देना है. वहीं, अगर मामला किसी व्यक्ति के जीवन या उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा हो, तो प्रशासन को मात्र 48 घंटों के भीतर जानकारी देनी पड़ती है. इसके अलावा, यदि मांगी गई जानकारी किसी तीसरी पार्टी से संबंधित हो, तो इसके लिए 40 दिन का समय निर्धारित है.
लापरवाही बरतने पर भारी जुर्माना
यदि कोई लोक सूचना अधिकारी तय समय में जानकारी नहीं देता या जानबूझकर लापरवाही बरतता है, तो कानून में कड़े जुर्माने का प्रावधान है. देर की स्थिति में दोषी अधिकारी पर ₹250 प्रतिदिन के हिसाब से जुर्माना लगाया जाता है. यह जुर्माना राशि अधिकतम ₹25,000 तक हो सकती है, जो सीधे अधिकारी की सैलरी से कटती है.




