Dainik Bhaskar: Bihar: Monday,
29 November 2021.
कभी नक्सली करार दिए जाने वाले दिव्यांग वीरेंद्र साह अब बच्चों की जिंदगी संवार रहे हैं। इसके लिए उन्हें लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी। उन्होंने पहले खुद पर से नक्सली होने का धब्बा हटाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी। फिर RTI के जरिए शिक्षक फर्जीवाड़े की पोल खोल दी। इसके बाद सरकारी स्कूल में बतौर शिक्षक उनकी नियुक्ति हुई। मामला सारण की पीर मकेर पंचायत का है।
पीर मकेर पंचायत में पंचायत शिक्षक पद पर वीरेंद्र और उनकी बहन आरती कुमारी की काउंसिलिंग हुई थी। 4 अक्टूबर 2006 को तत्कालीन पंचायत सचिव के समक्ष काउंसिलिंग हुई थी। प्रथम पैनल में नाम भी आया, लेकिन पंचायत इकाई की ओर से रिश्वत की मांग की गई। रिश्वत नहीं देने पर फाइनल सूची से नाम हटा दिया गया और फर्जी तरीके से शिक्षकों की बहाली कर ली गई। इसके बाद दिव्यांग वीरेंद्र ने प्रखंड से लेकर प्रमंडल, राज्य तथा देश के 21 अफसरों और 13 मंत्री समेत सांसदों के पास फरियाद लगाई, लेकिन न्याय नहीं मिला।
हाईकोर्ट का आदेश भी था बेअसर, आरटीआई से मिला सहारा
इंसाफ नहीं मिलने पर वीरेंद्र ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। दायर याचिका सीडब्लूजेसी संख्या 8588/2007 में कोर्ट ने नियोजन प्राधिकार वाद से रिपोर्ट तलब की। नियोजन इकाई से इंसाफ नहीं मिलने पर दिव्यांग ने दोबारा हाईकोर्ट में दस्तक दी। 13 मार्च 2012 को हाईकोर्ट ने फिर से नियोजन इकाई को तीन महीने के अंदर नियोजन देने का आदेश दिया।
इसके बावजूद जब नियोजन इकाई ने नियोजन नहीं किया तो उसने RTI के तहत शिक्षक बहाली से संबंधित जानकारी मांगी। जवाब मिलने के बाद फर्जीवाड़े का खुलासा हो गया। डीएम ने संज्ञान लेते हुए नियोजन इकाई पर प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया। आरटीआई से ही इंसाफ मिला। साथ ही वीरेंद्र और उसकी बहन को नौकरी मिली।
प्रखंड प्रमुख के घर पर हमला करने में बनाया गया था अभियुक्त
दिव्यांग वीरेंद्र कुमार को RTI का इस्तेमाल करना महंगा पड़ गया। 19 अगस्त 2007 को तत्कालीन प्रखंड प्रमुख गुड्डु शर्मा के अंगरक्षक की नक्सलियों ने हत्या की और उसके घर को डाइनामाइट से उड़ा दिया। इस मामले में वीरेंद्र को मुख्य अभियुक्त बनाया गया। नक्सली बनने के बाद भी वीरेंद्र ने लड़ाई नहीं छोड़ी और हाईकोर्ट से न्याय की गुहार लगाई। तत्कालीन मंत्री परवीन अमान्नुलाह की मदद से उसे इस मामले में इंसाफ मिला।
सरकारी स्कूल में बच्चों की संवार रहे जिंदगी
वीरेंद्र साह मधवल मध्य विद्यालय में कार्यरत हैं। वह आज बच्चों को वर्ग के अलावा ईमानदारी और सच्चाई का पाठ पढ़ाते हैं। अपने मोहल्ले, गांव में भी जिन लोगों को दबाने की कोशिश की जाती है। उसकी मदद करते हैं। ब्लॉक और अंचल में कर्मियों और अफसरों की भ्रष्टाचार RTI के सहारे खुलासा करते हैं। कानूनी लड़ाई के दौरान मजबूर होकर वीरेंद्र ने सुसाइड करने की भी कोशिश की थी।
कभी नक्सली करार दिए जाने वाले दिव्यांग वीरेंद्र साह अब बच्चों की जिंदगी संवार रहे हैं। इसके लिए उन्हें लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी। उन्होंने पहले खुद पर से नक्सली होने का धब्बा हटाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी। फिर RTI के जरिए शिक्षक फर्जीवाड़े की पोल खोल दी। इसके बाद सरकारी स्कूल में बतौर शिक्षक उनकी नियुक्ति हुई। मामला सारण की पीर मकेर पंचायत का है।
पीर मकेर पंचायत में पंचायत शिक्षक पद पर वीरेंद्र और उनकी बहन आरती कुमारी की काउंसिलिंग हुई थी। 4 अक्टूबर 2006 को तत्कालीन पंचायत सचिव के समक्ष काउंसिलिंग हुई थी। प्रथम पैनल में नाम भी आया, लेकिन पंचायत इकाई की ओर से रिश्वत की मांग की गई। रिश्वत नहीं देने पर फाइनल सूची से नाम हटा दिया गया और फर्जी तरीके से शिक्षकों की बहाली कर ली गई। इसके बाद दिव्यांग वीरेंद्र ने प्रखंड से लेकर प्रमंडल, राज्य तथा देश के 21 अफसरों और 13 मंत्री समेत सांसदों के पास फरियाद लगाई, लेकिन न्याय नहीं मिला।
हाईकोर्ट का आदेश भी था बेअसर, आरटीआई से मिला सहारा
इंसाफ नहीं मिलने पर वीरेंद्र ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। दायर याचिका सीडब्लूजेसी संख्या 8588/2007 में कोर्ट ने नियोजन प्राधिकार वाद से रिपोर्ट तलब की। नियोजन इकाई से इंसाफ नहीं मिलने पर दिव्यांग ने दोबारा हाईकोर्ट में दस्तक दी। 13 मार्च 2012 को हाईकोर्ट ने फिर से नियोजन इकाई को तीन महीने के अंदर नियोजन देने का आदेश दिया।
इसके बावजूद जब नियोजन इकाई ने नियोजन नहीं किया तो उसने RTI के तहत शिक्षक बहाली से संबंधित जानकारी मांगी। जवाब मिलने के बाद फर्जीवाड़े का खुलासा हो गया। डीएम ने संज्ञान लेते हुए नियोजन इकाई पर प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया। आरटीआई से ही इंसाफ मिला। साथ ही वीरेंद्र और उसकी बहन को नौकरी मिली।
प्रखंड प्रमुख के घर पर हमला करने में बनाया गया था अभियुक्त
दिव्यांग वीरेंद्र कुमार को RTI का इस्तेमाल करना महंगा पड़ गया। 19 अगस्त 2007 को तत्कालीन प्रखंड प्रमुख गुड्डु शर्मा के अंगरक्षक की नक्सलियों ने हत्या की और उसके घर को डाइनामाइट से उड़ा दिया। इस मामले में वीरेंद्र को मुख्य अभियुक्त बनाया गया। नक्सली बनने के बाद भी वीरेंद्र ने लड़ाई नहीं छोड़ी और हाईकोर्ट से न्याय की गुहार लगाई। तत्कालीन मंत्री परवीन अमान्नुलाह की मदद से उसे इस मामले में इंसाफ मिला।
सरकारी स्कूल में बच्चों की संवार रहे जिंदगी
वीरेंद्र साह मधवल मध्य विद्यालय में कार्यरत हैं। वह आज बच्चों को वर्ग के अलावा ईमानदारी और सच्चाई का पाठ पढ़ाते हैं। अपने मोहल्ले, गांव में भी जिन लोगों को दबाने की कोशिश की जाती है। उसकी मदद करते हैं। ब्लॉक और अंचल में कर्मियों और अफसरों की भ्रष्टाचार RTI के सहारे खुलासा करते हैं। कानूनी लड़ाई के दौरान मजबूर होकर वीरेंद्र ने सुसाइड करने की भी कोशिश की थी।