Wednesday, November 25, 2020

क्या है जम्मू-कश्मीर के रोशनी ज़मीन घोटाले की पूरी कहानी?

Lallantop: Wednesday, November 25, 2020.
एक देशज कहावत है कि ‘गए थे हरिभजन को, ओंटन लगे कपास,’ मतलब काम कुछ और करना था और करने लगे कुछ और. जम्मू-कश्मीर का रोशनी जमीन घोटाला इसी कहावत का नायाब नमूना है. जो कानून सरकार ने गरीबों को सस्ती जमीन और राज्य में बिजली लाने के लिए बनाया, उससे ही राज्य के इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला हो गया. बताया जा रहा है कि रोशनी लैंड स्कैम नाम घोटाले में 25 हजार करोड़ रुपए की जमीन का बंदरबांट हुआ है. जमीन को औने-पौने दामों पर नेताओं और नौकरशाहों को दे दिया गया और सरकार के हाथ आई कौड़ी. आइए आपको तफ्सील से बताते हैं जम्मू-कश्मीर के इस रोशनी लैंड स्कैम के बारे में.
सबसे पहले जानिए कि रोशनी ऐक्ट क्या है
सरकारी ज़मीन पर अवैध कब्ज़ा. ये लाइन आपने कई बार अखबारों में पढ़ी होगी. तो जो लोग सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा करके सालों साल रह रहे होते हैं, हटते भी नहीं हैं. तो इन लोगों को हटाने, फिर उन्हें रहने के लिए दूसरी जगह देने में ही प्रशासन का काफी टाइम और पैसा खप जाता है. इसी के समाधान के तौर पर जम्मू-कश्मीर में आया रोशनी ऐक्ट.
इस ऐक्ट के तहत लोगों को उस ज़मीन का मालिकाना हक देने की योजना बनी जिस पर उन्होंने अवैध कब्ज़ा कर रखा था. बदले में उन्हें चुकानी थी एक छोटी सी रकम. इस रकम का इस्तेमाल होता राज्य में बिजली का ढांचा सुधारने में. इसी से नाम पड़ा रोशनी ऐक्ट. अब मालिकाना हक के बदले कितनी रकम देनी होगी ये तय होती थी ज़मीन के लोकेशन और कितनी ज़मीन घेरी है उसके हिसाब से.
तो दिक्कत कहां शुरू हुई?
साल 2001 में फारूक अब्दुल्ला की सरकार ने यह कानून लागू किया. उस वक्त सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करने वालों को मालिकाना हक देने के लिए 1990 को कट ऑफ वर्ष मान लिया गया. मतलब जो लोग 1990 या उससे पहले से किसी जमीन पर काबिज हैं तो वह इस एक्ट के प्रावधानों के तहत जमीन का मालिकाना हक पाने के हकदार थे. शुरुआत में कुछ किसानों को इसका फायदा भी मिला. लेकिन ऐसा हर जमीन के मामले में नहीं किया गया. समय बदला और सरकारें बदलीं. जम्मू-कश्मीर में आने वाली हर सरकार ने अपने हिसाब से रोशनी एक्ट में बदलाव करके 1990 के इस कट ऑफ साल को बदलना शुरू कर दिया. इसका फायदा यह हुआ कि ज्यादा से ज्यादा लोग इस एक्ट के दायरे में आते चले गए.
जम्मू-कश्मीर में रोशनी एक्ट को आम लोगों को सस्ती जमीन उपलब्ध कराने और सरकार का रेवेन्यू बढ़ाने के लिए लाया गया था. लेकिन इसे बंदरबांट का तरीका बना लिया गया.
पहला संशोधन 2004 में मुफ्ती मोहम्मद सईद की पीडीपी-कांग्रेस की सरकार ने किया. इसके बाद 2007 में गुलाम नबी आजाद की सरकार के दौरान भी कानून में बदलाव किया गया. मुफ्ती मोहम्मद सईद सरकार ने कट ऑफ तारीख 1990 से बढ़ाकर 2004 कर दी तो गुलाम नबी आजाद सरकार ने इसे बढ़ाकर 2007 कर दिया.
दूसरी दिक्कत ये आई कि जिस योजना का उद्देश्य आम लोगों को जमीन का आवंटन करना और मिली रकम का इस्तेमाल राज्य में बिजली ढांचे को सुधारने में किया जाना था, उस योजना का फायदा रसूखदारों ने अपने और अपने रिश्तेदारों को पहुंचाया. उनके नाम ज़मीन आवंटित कर दी.
कैसे खुला पूरा मामला?
2011 में जम्मू-कश्मीर के रिटायर्ड प्रोफेसर एसके भल्ला ने एडवोकेट शेख शकील के जरिए इस मामले में जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट में RTI फाइल करवाई. उन्होंने इस याचिका में सरकारी और जंगली जमीन में बड़ी गड़बड़ी के आरोप लगाए. मामला कोर्ट में चलता रहा. पूरे मामले का खुलासा 2014 में आई CAG यानी कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल की रिपोर्ट में हुआ. CAG ने 2007 से 2013 के बीच जमीन ट्रांसफर करने के मामले में गड़बड़ी की बात कही. CAG की रिपोर्ट में कहा गया कि सरकार को जिस जमीन के बदले 25,000 करोड़ रुपए मिलने चाहिए थे, उसके बदले उसे सिर्फ 76 करोड़ रुपये ही मिले.
CAG की रिपोर्ट के आधार पर 2014 में एडवोकेट अंकुर शर्मा ने हाई कोर्ट में एक याचिका दाखिल की. याचिका में कहा गया कि मामले में बहुत रसूखदार लोग शामिल हैं, ऐसे में रोशनी जमीन घोटाले के केस की जांच CBI को ट्रांसफर कर दी जाए. इस बीच 2018 में तत्कालीन राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने रोशनी एक्ट को ही निरस्त कर दिया. 9 अक्टूबर, 2020 को जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने इस केस की जांच CBI को सौंप दी. हाई कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि इस मामले में गलत तरीके से आवंटित जमीनें वापस ली जाएं और जिन प्रभावशाली लोगों को जमीन दी गई, उनके नाम भी सार्वजनिक किए जाएं. इसके बाद कई बड़े नेताओं और नौकरशाहों के नाम सामने आए हैं.
जमीन हड़पने के मामले को सबसे पहले 2011 में प्रोफेसर रिटायर्ड प्रोफेसर एसके भल्ला (बाएं) हाईकोर्ट लेकर गए. उसके बाद वकील अंकित शर्मा 2014 ने भी कोर्ट में याचिका दाखिल की.
कितनी जमीन है और किस-किस को मिली है?
आइए अब जान लेते हैं कि रोशनी लैंड स्कैम में कितनी जमीन का बंदरबांट हुआ और कौन खास लोग हैं जिन्हें जमीन दी गई. हाईकोर्ट में मामला ले जाने वाले वकील अंकित शर्मा का दावा है,
यह मामला 20 लाख कनाल जमीन का है. इसमें से 3.5 लाख कनाल जमीन 30 हजार लोगों को आवंटित की गईं. जिसे पिछले महीने आए हाईकोर्ट के आदेश के बाद वापस लिया जाएगा. बची तकरीबन 16.5 लाख कनाल जमीन पर अब भी अवैध कब्जे है और इसे भी वापस लिया जाएगा.
(आपको बता दें कि 1 कनाल जमीन आमतौर पर तकरीबन 5400 वर्ग फीट के बराबर होती है.)
अब यह भी जान लीजिए इस घोटाले में किन बड़े लोगों का नाम आया है
# इस घोटाले में जो सबसे बड़ा नाम सामने आ रहा है वह है जम्मू-कश्मीर के पूर्व वित्त मंत्री और पीडीपी नेता हसीब द्राबू का. उनके अलावा उनके परिवार के इफ्तिखार अहमद द्राबू. एजाज द्राबू, और शहजादा बानो को 1-1 कनाल जमीन आवंटित की गई. हसीब वही शख्स हैं जिन्हें मुफ्ती मोहम्मद सईद ने 2015 में बीजेपी के साथ मिल कर सरकार बनाने की बात करने के लिए चुना था. तीन महीने हसीब ने बीजेपी की तरफ से नियुक्त वार्ताकार राम माधव से बातचीत की और जम्मू-कश्मीर में बीजेपी-पीडीपी की सरकार बनी. हसीब सन 2015 से 2018 तक जम्मू-कश्मीर के वित्त मंत्री रहे. उनके एक बयान की वजह से महबूबा मुफ्ती ने उन्हें सरकार से बर्खास्त कर दिया था.
हसीब द्राबू ने किसी भी तरह के घोटाले की बात से इनकार किया है. उनका कहना है,
जिस जमीन की बात हो रही है उसे मेरे दादाजी ने 1956 में मेरे पैदा होने से पहले 56,000 रुपए में लीज पर ली थी. उसके बाद से यह जमीन हमारे परिवार के पास है. बाद में 1980, 1990 और 2004 में लीज को 40 रुपए सालाना की रकम पर बढ़वाया गया. हम अब भी हर साल लीज के 40 रुपए भरते हैं. मैं उस जमीन पर रहता तक नहीं हूं. वहां मेरी मां और भाई रहते हैं. मेरे पास मुंबई में एक घर है जिसमें मैं रहता हूं. पिछले डेढ़ साल से मैं यहीं हूं.
पीडीपी सरकार के बड़े नेता और पूर्व वित्तमंत्री हसीब द्राबू का नाम भी इस घोटाले में आ रहा है.
# लिस्ट में नैशनल कांफ्रेंस के दफ्तर का नाम भी है. इसे लेकर फारुख अब्दुल्ला पर भी उंगलियां उठ रही हैं. इंडिया टुडे के संवाददाता को फारुख अब्दुल्ला ने इसे खुद को डिस्टर्ब करने की साजिश बताया है. नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता देवेंद्र राणा ने कहा,
मामला कोर्ट में है. हां, यह बात सही है कि कानून फारुख अब्दुल्ला की सरकार में 2001 में बना लेकिन इसे कई बार बदला गया है. हम दूसरी सरकारों को भी दोष नहीं दे रहे क्योंकि मामला कोर्ट में है. नेशनल कॉन्फ्रेंस का ऑफिस जिस जमीन पर है वह लीज पर है और उसे रोशनी एक्ट के तहत ही रेग्युलराइज किया गया है. किसी भी तरह की गड़बड़ी नहीं हुई है. सीबीआई जांच करे और कोर्ट का फैसला आ जाए. हम कोर्ट के फैसले को मानेंगे.
# जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस बड़े नेता और बिजनेसमैन केके अमला पर आरोप है कि उन्होंने अपने रिश्तेदार रचना अमला, वीणा अमला और फकीर चंद अमला के नाम पर जमीन आवंटित कराई.
# बड़े बिजनेसमैन मुस्ताक अहमद चाया पर अपने नाम जमीन आवंटित कराने का आरोप है.
# चीफ सेक्रेटरी लेवल के रिटायर्ट आईएएस अधिकारी मोहम्मद सफी पंडित और उनकी पत्नी निघत पंडित पर आरोप है कि उन्होंने अपने नाम पर जमीन आवंटित कराई.
# नैशनल कॉन्फ्रेंस लीडर और पूर्व एडवोकेट जनरल असलम गोनी पर भी अपने नाम पर जमीन आवंटित कराने का आरोप है..
# इसके अलावा बिजनैसमैन सैयद मुजफ्फर आगा, सैयद अखनून, एमवाई खान, अब्दुल मजीन वाणी, असलम गोनी, हरून चौधरी, सुज्जाद किचलू, तनवीर किचलू और कुछ अन्य लोगों का नाम इसमें सामने आया है.
अब क्या होगा?
जम्मू-कश्मीर के इतिहास के सबसे बड़े जमीन घोटाले को लेकर राज्य के एलजी मनोज सिन्हा ने साफ-साफ कहा था कि सभी से जमीन वापस ली जाएगी. ऐसे में जमीन वापसी का काम शुरू हो गया है. हाई कोर्ट का भी आदेश है कि जितनी ज़मीनें आवंटित की गई हैं सभी वापस ली जाएं. इसका राजनैतिक असर भी जरूर दिखेगा. अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में लोकतांत्रिक प्रक्रिया की शुरुआत के तहत राज्य में DDC यानी जिला विकास परिषद के चुनाव होने वाले हैं. ये चुनाव 28 नवंबर से 24 दिसंबर तक 8 चरणों में होंगे. इसमें सभी राजनैतिक पार्टियां अपना दम दिखाना चाहेंगी ऐसे में रोशनी जमीन घोटाला भी एक बड़ा मुद्दा बन सकता है.