दैनिक जागरण: बरेली: Wednesday,
March 14, 2018.
सूचना
के अधिकार के आवेदन को बड़े-बड़े कारण और गोपनीयता का हवाला देकर लटकाने वाले अफसर
जब सवालों के चंगुल में फंसे तो लड़खड़ा गए। वे राज्य सूचना आयुक्त को आवेदन पत्रों
को अस्वीकार करने के नियम,
प्रावधान और प्रारूप ही
नहीं बता सके। आरटीआइ एक्ट पर अफसरों के ज्ञान की पोल खुली कलेक्ट्रेट सभागार में
राज्य सूचना आयुक्त विजय शंकर शर्मा की मौजूदगी में हुई विशेष कार्यशाला में। लखनऊ
से आए रिसोर्स पर्सन राजेश मेहतानी ने कार्यशाला में कहा कि विभागीय मामला, व्यक्तिगत और गोपनीय बताकर सूचना देने से मना नहीं कर
सकते।
आयुक्त
ने कहा कि जिले में संबंधित विभाग अपने स्तर पर सूचना तो छोड़िए, अपील तक का निस्तारण नहीं कर पाते। आयोग में अपील और
सुनवाई का इसी कारण अंबार लग जाता है। तीन वर्ष में एक लाख 15 हजार केस निपटे हैं, जो
रिकार्ड में उपलब्ध है वही देना है। नई सूचना तो बनानी नहीं है।
रिसोर्स
पर्सन ने बताया कि आरटीआइ भारत में तो 2005
में लागू हुआ। स्वीडन
में 1766 में ही लागू हो चुका था। अब 98 देशों में यह कानून है। कार्यशाला में अपर आयुक्त
रामसूरत पांडेय ने आभार जताया। डी यह भी जानें
- 500 से अधिक शब्द होने पर आवेदन हो सकता है खारिज।
- धारणा बनाने, राय, परामर्श देने या निष्कर्ष निकालना आरटीआइ में नहीं।
- इंडियन ऑफीशियल सीक्रेट एक्ट और आरटीआइ में प्रावधान होने पर आरटीआइ के नियम माने जाएंगे।
- मांगी गई सूचना की प्रतियों और शुल्क की गणना सटीक बताएं, लगभग में नहीं दे सकते।
- शुल्क के तहत ली गई धनराशि नॉन रिफंडेबल, आरटीआइ कोष में जमा की सुविधा है, निकासी नहीं।
- केवल देश की सुरक्षा से संबंधित सूचना नहीं दे सकते।
- बीपीएल श्रेणी के आवेदक से नहीं ले सकते शुल्क।
- तय अवधि बीतने पर नहीं ले सकते सूचना उपलब्ध कराने का अतिरिक्त शुल्क।
- सूचना उपलब्ध न होने पर आवेदन प्रारूप-6 पर भरकर और कारणों का उल्लेख कर ही अस्वीकृत करें।
अफसरों
की कम जानकारी, आरटीआइ एक्ट पर पड़ रही भारी
सूचना
का अधिकार अधिनियम पूरे देश में 2005 में अस्तित्व में आया था। 13 साल हो गए
अधिनियम को लागू हुए, लेकिन जिले में विभिन्न
विभागों के जनसूचना अधिकारी अब तक इस एक्ट और उसके प्रावधानों को ही पूरी तरह नहीं
समझ सके। इसी कारण जिले की सामान्य सी सूचना देने की अपील भी राज्य सूचना आयोग तक
पहुंचती है। यह कहना है राज्य सूचना आयुक्त विजय शंकर शर्मा का। वह मंगलवार को
कलेक्ट्रेट में आयोजित आरटीआइ कार्यशाला में शिरकत करने आए थे। इस दौरान उन्होंने
मीडिया से भी बातचीत की।
आयुक्त
ने कहा कि ज्यादातर मामले 30 दिन के भीतर वांछित सूचना न देने के हैं। कोई खास
विभाग नहीं, बल्कि हर विभाग में ऐसा हो रहा है। अफसर यही तय नहीं कर
पाते कि सूचना दें या ना दें और उपलब्ध कराएं तो क्या-क्या दें। कई मामलों में लोग
क्या, क्यों और कैसे तक पूछते हैं,
यह भी दिक्कत है। जिलों
की स्थिति पूछने पर बताया कि आयोग में छह आयुक्त हैं। मेरे पास बरेली और कानपुर
मंडल की जिम्मेदारी है। बरेली मंडल के 5000 से ज्यादा प्रकरण आयोग में लंबित हैं, लेकिन
यहां की स्थिति कानपुर से बेहतर है। बिना कोई कारण के सूचना देने में देरी, सही
सूचना न देने वाले अधिकारियों को धारा-30 क के तहत दंड का प्रावधान है। पद कोई भी
रहे जिम्मेदार अधिकारी के खिलाफ प्रतिदिन 250 रुपये के आधार पर जुर्माना वसूला
जाएगा। एम
राघवेंद्र विक्रम सिंह, सीडीओ सत्येंद्र कुमार, सभी एडीएम और विभागों के अधिकारी मौजूद थे।