अमर
उजाला: फरीदाबाद: Friday, 07 November 2014.
फरीदाबाद
में वासुदेव, जोखन महतो, सचिन सौरोत,
शैलेश सिंह, तारा और सिपाही महतो जैसे सैकड़ों श्रमिकों की मौत
फ्लैट और फैक्ट्रियों के निर्माण के दौरान हुई।
इन्हें
बचाया जा सकता था। लेकिन जब सारे नियम कागजों तक सिमटे रह जाएं तो श्रमिकों के
हिस्से मौत आती है। हम बात कर रहे हैं औद्योगिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा से जुड़ी
लापरवाही की।
हादसे
दर हादसे होते हैं। फिर वह जांच की फाइलों में दफन हो जाते हैं। अब लोगों ने इन
मुद्दों पर सवाल उठाना शुरू किया है तो जवाबदेह लोग परेशान हो रहे हैं। यह
औद्योगिक नगरी है।
यहां
उद्योगों की तरक्की के साथ-साथ श्रमिकों के स्वास्थ्य से जुड़ा मसला भी उतनी ही
संवेदनशीलता से उठना चाहिए,
लेकिन ऐसा होता नहीं। एक
संवेदनशील आरटीआई कार्यकर्ता ने उन श्रमिकों के स्वास्थ्य से जुड़े सवाल पूछे
जिनके पसीने से इस शहर में तरक्की की नींव पड़ी है।
लेकिन
श्रम विभाग से जुड़ा औद्योगिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य विंग पोलपट्टी खुलने के डर से
बहानेबाजी करने में जुट गया है। पेश है 'अमर उजाला' संवाददाता ओम प्रकाश की रिपोर्ट:
ऐसे
क्यों नहीं दे रहे हैं जवाब:
पत्थरों
की धूल से होने वाली जानलेवा बीमारी सिलिकोसिस पर स्वास्थ्य विभाग मुंह खोलने को
राजी नहीं दिख रहा है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर क्रेशर जोन में हुए सर्वे और
स्वास्थ्य जांच के बाद सेक्टर-29 निवासी आरके भगत ने इससे
ग्रस्त पाए गए श्रमिकों की जानकारी मांगी है। लेकिन, विभाग
इसमें आनाकानी कर रहा है।
औद्योगिक
श्रमिकों के स्वास्थ्य से संबंधित पूछे गए 13 सवालों का जवाब देने के लिए
विभाग ने 12,310 रुपये मांग लिए। कहा गया कि
यह सूचनाएं 6155 पेज में आएंगी। जब आरटीआई
एक्ट के मुताबिक ई-मेल, सीडी या फ्लॉपी में सूचनाएं
मांगी गईं तो विभाग ने ऐसा करने से लिखित रूप में मना कर दिया। सूचना मांगने वाले
भगत ने इस कदम को सूचना न देने का बहाना बताया है।
पीपल्स
राइट्स एंड सोशल रिसर्च सेंटर के निदेशक एसए आजाद ॠे बताया कि ऑक्युपेशनल हेल्थ
अहमदाबाद की एक रिसर्च में कहा गया है कि पत्थर खदानों में काम करने वाले 54 फीसदी लोग सिलिकोसिस से ग्रसित होते हैं। जिन पर न तो
खान मालिक ध्यान देते हैं और न ही श्रम विभाग। देश भर में कितने लोग इस बीमारी से
मर चुके हैं, इसका कोई रिकार्ड नहीं है। इस
बीमारी को क्रेशर जोन मालिकों की लॉबी ने कभी सामने ही नहीं आने दिया।
बढ़
रहा निर्माण और बंद कर दी डिस्पेंसरी:
औद्योगिक
सुरक्षा एवं स्वास्थ्य विंग के अधीन दो डिस्पेंसरी थीं। इनके माध्यम से निर्माण
कार्य में जुटे श्रमिकों का इलाज होता था। शहर में निर्माण बढ़ रहे हैं। ग्रेटर
फरीदाबाद बन रहा है। इंडस्ट्रियल मॉडल टाउनशिप बन रही है, लेकिन दोनों डिस्पेंसरियां बंद कर दी गईं। अब आरटीआई
में इसका जवाब देते नहीं बन रहा है।
वर्ष
2008 से 2012 तक सबसे ज्यादा निर्माण और आग
से हादसे हुए हैं। कुल 33 हादसों में 80 लोगों की मौत का रिकार्ड है। इसके बाद भी घटनाएं
रुकी नहीं हैं। आए दिन किसी न किसी कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट पर श्रमिक गिरकर मरते
रहते हैं। इसलिए जवाब देने में परेशानी हो रही है।
और
अब मुफ्त में देनी पड़ सकती है सूचना:
आरटीआई
एक्टिविस्ट एसोसिएशन के संरक्षक पद्मश्री डॉ. ब्रह्मदत्त के मुताबिक यदि सूचना के
लिए रुपये मांगने की जानकारी आवेदक को सात दिन के अंदर नहीं दी गई है तो विभाग को
सूचना मुफ्त देनी पड़ेगी। आवेदनकर्ता ने मुफ्त सूचना के लिए औद्योगिक सुरक्षा एवं
स्वास्थ्य के उप निदेशक को पत्र लिख दिया है।
इन
सवालों से परेशान है विभाग:
श्रम
विभाग की औद्योगिक स्वास्थ्य विंग ने 2009 से 2014 तक कितने श्रमिकों का मेडिकल चेकअप किया। वे किन
निर्माणाधीन स्थानों पर काम कर रहे थे। कितने कैंप लगाए गए?
- 2009 से 2014 तक विभाग ने कितनी दवाइयां खरीदीं। उसका परचेज ऑर्डर और बिल की कॉपी।
- क्रेशर जोन की कितनी साइटों पर श्रमिकों की एक्सरे जांच की गई है। उनके नाम, पते। कितने श्रमिकों को दमे, टीबी और कैंसर की शिकायत है। उन्हें क्या दवा दी?
- इस विंग की डिस्पेंसरी में कितने डॉक्टर हैं। अगर कोई डिस्पेंसरी बंद हुई तो किसके आदेश पर। ऐसे हालात में निर्माणाधीन कार्यस्थलों पर श्रमिकों की जांच कौन कर रहा है?