Live हिन्दुस्तान: नई दिल्ली: Monday, 13 October 2014.
सूचना
का अधिकार (आरटीआई) जब कानून बना तो इसका मकसद निश्चित अवधि में लोगों को जानकारी
देना था। ताकि सरकारी विभागों में पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके। लेकिन सूचना
पाने के लिए निर्धारित प्रकिया और नियम कायदे इस मकसद को कहीं पीछे छोड़ते नजर आ
रहे हैं। केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) में पिछले सात साल में पंजीकृत एक चौथाई से
अधिक शिकायतों एवं अपीलों का लंबित होना इसकी तसदीक करते हैं।
आधिकारिक
आंकड़ों के मुताबिक मौजूदा समय में सीआईसी के समक्ष 31,591 मामले और देश के 23
सूचना आयोगों में करीब दो लाख मामले लंबित हैं। इसके मद्देनजर आरटीआई कार्यकर्ताओं
ने प्रक्रिया को सरल बनाने पर जोर दिया है। वे चाहते हैं की सूचना के अधिकार को
विकास की प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के हथियार के रूप में
प्रोत्साहित किया जाए।
समाजसेवी
अरुणा राय कहती हैं, आज आरटीआई की व्यापकता को लोग
आसानी से नहीं समझ पा रहे हैं। उनके मुताबिक आरटीआई महज भ्रष्टाचार का भंडाफोड़
करने तक सीमित करके देखने की प्रवृत्ति बन गई है। जबकि इसे समूचे लोकतंत्र का
कायाकल्प करने की वैकल्पिक राजनीति से जोड़कर देखा जाना चाहिए। आरटीआई आंदोलन से
जुड़े मनीष सिसोदिया का कहना है, सूचना हासिल करने में मुख्य
बाधा सूचना देने वाले की मानसिकता एवं प्रक्रिया है। वहीं आरटीआई कार्यकर्ता
लक्ष्मी नारायण मोदी ने आरोप लगाया कि आरटीआई कानून को निष्प्रभावी बनाने की
कोशिशें की जा रही है।
गौरतलब
है कि वर्ष 2006 से 20013 तक सीआईसी के समक्ष 1,47,924 अपीलें एवं शिकायतें
पंजीकृत की गईं। इनमें 1,16,333 मामलों का निपटारा किया गया। जबकि 31,591 मामले
अभी भी सीआईसी के समक्ष लंबित है। वहीं राज्य स्तर पर कार्य कर रहे सूचना आयोगों
में सबसे अधिक 48,452 शिकायतें उत्तर प्रदेश में लंबित है। इसके बाद महाराष्ट्र का
स्थान है।
सांसद
निधि योजना को बंद करने का प्रस्ताव नहीं:
सरकार
ने आरटीआई आवेदन के जवाब में स्पष्ट किया है कि सांसद निधि योजना खत्म करने का
प्रस्ताव उसे नहीं मिला है और नाही उसके पास ऐसा कोई प्रस्ताव विचाराधीन है।
सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय कहा कि एमपीलैड खत्म करने के लिए
लोकसभा या राज्य सभा के किसी सांसद से लिखित में आग्रह प्राप्त नहीं हुआ है।
हालांकि, मंत्रालय कुछ वर्तमान एवं पूर्व संसद सदस्यों की ओर से इस
मुद्दे पर प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में व्यक्त की गई भावनाओं से अवगत है।
संसदीय
पेंशन पूर्व सांसदों का कानूनी हक:
आरटीआई
के तहत दी गई जानकारी में कहा गया है कि संसदीय पेंशन पूर्व सांसदों का कानूनी हक
है। वे अन्य पेंशन लेने के साथ ही पूर्व संसद सदस्य के रूप में मिलने वाली पेंशन
पाते रहेंगे। राज्यसभा सचिवालय ने अपने जवाब में कहा कि संसद के पूर्व सदस्यों की
पेंशन संसद सदस्य वेतन, भत्ता और पेंशन अधिनियम 1954
द्वारा विनियमित होती है, जिसमें पूर्व में मिल रहे
पेंशन पर स्थिति स्पष्ट नहीं की गई है। हालांकि,
सचिवालय ने ऐसे पूर्व
सांसदों व मौजूदा सांसदों के नाम बताने में अपनी असमर्थता जताई है, जो
विधानसभा या विधानसभा परिषद सदस्य होने के नाते पेंशन या अन्य सुविधाएं प्राप्त कर
रहे हैं। सचिवालय के मुताबिक इसका लेखाजोखा उसके पास नहीं है।