Nai Dunia: Indore: Sunday, 06 July 2014.
क्या
कोई सरकारी संस्थान आरटीआई के तहत जवाब देने बच सकता है? मप्र लोक सेवा आयोग तो कुछ ऐसा ही कर रहा है। जिन
सवालों के जवाब आसानी से मिलना चाहिए,
उनके लिए यहां महीनों
इंतजार करना पड़ रहा है। कई मामलों में तो कोई प्रतिक्रिया ही नहीं दी जा रही। आयोग
पर प्रोफेसर व अन्य भर्ती प्रक्रियाओं के कारण पहले ही सवाल उठ रहे हैं, ऐसे में अब सवालों के जवाब न देना संदेह को और गहरा
रहा है। एमपी पीएससी की प्रक्रिया एसटीएफ की जांच में आने के बाद उम्मीदवारों का
आरोप है कि व्यापमं की तरह आयोग की कई परीक्षाओं और चयन प्रक्रिया में भी गड़बड़ी
हुई है। इसकी भी जांच होना चाहिए।
आयोग
कई मायनों में खुद को स्वतंत्र बॉडी मानता है, लेकिन
गजट नोटिफिकेशन और अन्य नियमों को देखा जाए तो आयोग जिम्मेदार बॉडी है और इससे
सवाल पूछे जा सकते हैं। पिछले साल प्री पीएससी को लेकर न्यायालय में लगे मामले में
भी कोर्ट की फटकार के बाद आयोग ने एक छात्रा के मार्क्स बताए थे।
चाहिए
12 सवालों के जवाब:
आरटीआई
लगाने वाले उम्मीदवारों ने करीब 12
तरह के सवालों के जवाब
मांगे हैं। इनमें मार्क्स,
कटऑफ की स्थिति, सिलेक्शन पैनल में शामिल एक्सपर्ट्स के नाम, एलिजिबिलटी जैसे सवाल पूछे हैं। आरटीआई लगाने वाले
डॉ. शैलेंद्र शर्मा का कहना है पहली बार आरटीआई लगाने पर लगा कि शायद आवेदन आयोग
के पास आवेदन नहीं पहुंचा होगा। दोबारा आरटीआई लगाई, लेकिन
कई दिनों तक इसका भी जवाब नहीं मिला। प्रोफेसर भर्ती प्रक्रिया में शामिल डॉ.
हिदायत अहमद मंसूरी ने भी पांच बार रिमाइंडर दिए, लेकिन
जवाब नहीं मिला। इस बारे में वे केंद्र सरकार को भी पत्र भेजकर शिकायत कर चुके
हैं। चूंकि ज्यादातर उम्मीदवार कोर्ट जाना चाहते हैं इसलिए माना जा रहा है कि आयोग
जानबूझकर जवाब नहीं दे रहा।
प्रोफेसर
चयन प्रक्रिया की जांच होनी चाहिए। इसमें नियमों की धज्जियां उड़ाई गई हैं। कोर्ट
जाने के पहले हमने तीन साल पहले आरटीआई लगाई थी, लेकिन
पांच बार रिमाइंडर देने के बाद भी जवाब नहीं मिला।